Showing posts with label पाल इतिहास. Show all posts
Showing posts with label पाल इतिहास. Show all posts

Saturday, 3 February 2018

पाल वंश का इतिहास

पाल साम्राज्य

पाल साम्राज्य

हर्ष के समय के बाद से उत्तरी भारत के प्रभुत्व का प्रतीक कन्नौज माना जाता था। बाद में यह स्थान दिल्ली ने प्राप्त कर लिया। पाल साम्राज्य की नींव 750 ई. में 'गोपाल' नामक राजा ने डाली। बताया जाता है कि उस क्षेत्र में फैली अशान्ति को दबाने के लिए कुछ प्रमुख लोगों ने उसको राजा के रूप में चुना। इस प्रकार राजा का निर्वाचन एक अभूतपूर्व घटना थी। इसका अर्थ शायद यह है कि गोपाल उस क्षेत्र के सभी महत्त्वपूर्ण लोगों का समर्थन प्राप्त करने में सफल हो सका और इससे उसे अपनी स्थिति मज़बूत करन में काफ़ी सहायता मिली।

पाल वंश का सबसे बड़ा सम्राट 'गोपाल' का पुत्र 'धर्मपाल' था। इसने 770 से लेकर 810 ई. तक राज्य किया। कन्नौज के प्रभुत्व के लिए संघर्ष इसी के शासनकाल में आरम्भ हुआ। इस समय के शासकों की यह मान्यता थी कि जो कन्नौज का शासक होगा, उसे सम्पूर्ण उत्तरी भारत के सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया जाएगा। कन्नौज पर नियंत्रण का अर्थ यह भी थी कि उस शासक का, ऊपरी गंगा घाटी और उसके विशाल प्राकृतिक साधनों पर भी नियंत्रण हो जाएगा। पहले प्रतिहार शासक 'वत्सराज' ने धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पर इसी समय राष्ट्रकूट सम्राट 'ध्रुव', जो गुजरात और मालवा पर प्रभुत्व के लिए प्रतिहारों से संघर्ष कर रहा था, उसने उत्तरी भारत पर धावा बोल दिया। काफ़ी तैयारियों के बाद उसने नर्मदा पार कर आधुनिक झाँसी के निकट वत्सराज को युद्ध में पराजित किया। इसके बाद उसने आगे बढ़कर गंगा घाटी में धर्मपाल को हराया। इन विजयों के बाद यह राष्ट्रकूट सम्राट 790 में दक्षिण लौट आया। ऐसा लगता है कि कन्नौज पर अधिकार प्राप्त करने की इसकी कोई विशेष इच्छा नहीं थी और ये केवल गुजरात और मालवा को अपने अधीन करने के लिए प्रतिहारों की शक्ति को समाप्त कर देना चाहता था। वह अपने दोनों लक्ष्यों में सफल रहा। उधर प्रतिहारों के कमज़ोर पड़ने से धर्मपाल को भी लाभ पहुँचा। वह अपनी हार से शीघ्र उठ खड़ा हुआ और उसने अपने एक व्यक्ति को कन्नौज के सिंहासन पर बैठा दिया। यहाँ उसने एक विशाल दरबार का आयोजन किया। जिसमें आस-पड़ोस के क्षेत्रों के कई छोटै राजाओं ने भाग लिया। इनमें गांधार (पश्चिमी पंजाब तथा काबुल घाटी), मद्र (मध्य पंजाब), पूर्वी राजस्थान तथा मालवा के राजा शामिल थे। इस प्रकार धर्मपाल को सच्चे अर्थों में उत्तरपथस्वामिन कहा जा सकता है। प्रतिहार साम्राज्य को इससे बड़ा धक्का लगा और राष्ट्रकूटों द्वारा पराजित होने के बाद वत्सराज का नाम भी नहीं सुना जाता। विषय सूची

इन तीनों साम्राज्यों के बीच क़रीब 200 साल तक आपसी संघर्ष चला। एक बार फिर कन्नौज के प्रभुत्व के लिए धर्मपाल को प्रतिहार सम्राट 'नागभट्ट' द्वितीय से युद्ध करना पड़ा। ग्वालियर के निकट एक अभिलेख मिला है, जो नागभट्ट की मृत्यु के 50 वर्षों बाद लिखा गया और जिसमें उसकी विजय की चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि नागभट्ट द्वितीय ने मालवा तथा मध्य भारत के कुछ हिस्सों पर विजय प्राप्त की तथा 'तुरुष्क तथा सैन्धव' को पराजित किया जो शायद सिंध में अरब शासक और उनके तुर्की सिपाही थे। उसने बंग सम्राट को, जो शायद धर्मपाल था, को भी पराजित किया और उसे मुंगेर तक खदेड़ दिया। लेकिन एक बार फिर राष्ट्रकूट बीच में आ गए। राष्ट्रकूट सम्राट गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत में अपने पैर रखे और नागभट्ट द्वितीय को पीछे हटना पड़ा। बुंदेलखण्ड के निकट एक युद्ध में गोविन्द तृतीय ने उसे पराजित कर दिया। लेकिन एक बार पुनः राष्ट्रकूट सम्राट मालवा और गुजरात पर अधिकार प्राप्त करने के बाद वापस दक्षिण लौट आया। ये घटनाएँ लगभग 806 से 870 ई. के बीच हुई। जब पाल शासक कन्नौज तथा ऊपरी गंगा घाटी पर अपना प्रभुत्व क़ायम करने में असफल हुए, तो उन्होंने अन्य क्षेत्रों की तरफ अपना ध्यान दिया। धर्मपाल के पुत्र देवपाल ने, जो 810 ई. में सिंहासन पर बैठा और 40 वर्षों तक राज्य किया, प्रागज्योतिषपुर (असम) तथा उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव क़ायम कर लिया। नेपाल का कुछ हिस्सा भी शायद पाल सम्राटों के अधीन था। देवपाल की मृत्यु के बाद पाल साम्राज्य का विघटन हो गया। पर दसवीं शताब्दी के अंत में यह फिर से उठ खड़ा हुआ और तेरहवीं शताब्दी तक इसका प्रभाव क़ायम रहा। अरब व्यापारी सुलेमान के अनुसार

1 अरब व्यापारी सुलेमान के अनुसार :- पाल वंश के आरम्भ के शासकों ने आठवीं शताब्दी के मध्य से लेकर दसवीं शताब्दी के मध्य, अर्थात क़रीब 200 वर्षों तक उत्तरी भारत के पूर्वी क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व क़ायम रखा। दसवीं शताब्दी के मध्य में भारत आने वाले एक अरब व्यापारी सुलेमान ने पाल साम्राज्य की शक्ति और समृद्धि की चर्चा की है। उसने पाल राज्य को 'रूहमा' कहकर पुकारा है (यह शायद धर्मपाल के छोटे रूप 'धर्म' पर आधारित है) और कहा है कि पाल शासक और उसके पड़ोसी राज्यों, प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों में लड़ाई चलती रहती थी, लेकिन पाल शासन की सेना उसके दोनों शत्रुओं की सेनाओं से बड़ी थी। सुलेमान ने बताया है कि पाल शासक 50 हज़ार हाथियों के साथ युद्ध में जाता था और 10 से 15 हज़ार व्यक्ति केवल उसके सैनिकों के कपड़ों को धोने के लिए नियुक्त थे। इससे उसकी सेना का अनुमान लगाया जा सकता है।

1.1 तिब्बती ग्रंथों से :-

पाल वंश के बारे में हमें तिब्बती ग्रंथों से भी पता चलता है, यद्यपि यह सतरहवीं शताब्दी में लिखे गए। इनके अनुसार पाल शासक बौद्ध धर्म तथा ज्ञान को संरक्षण और बढ़ावा देते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय को, जो सारे पूर्वी क्षेत्र में विख्यात है, धर्मपाल ने पुनः जीवित किया और उसके खर्चे के लिए 200 गाँवों का दान दिया। उसने विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की भी स्थापना की। जिसकी ख्याति केवल नालन्दा के बाद है। यह मगध में गंगा के निकट एक पहाड़ी चोटी पर स्थित था। पाल शासकों ने कई बार विहारों का भी निर्माण किया जिसमें बड़ी संख्या में बौद्ध रहते थे। पाल शासक और तिब्बत

1.2 पाल शासक और तिब्बत :-

पाल शासकों के तिब्बत के साथ भी बड़े निकट के सांस्कृतिक सम्बन्ध थे। उन्होंने प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान सन्तरक्षित तथा दीपकर (जो अतिसा के नाम से भी जाने जाते हैं) को तिब्बत आने का निमंत्रण दिया और वहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म के एक नए रूप को प्रचलित किया। नालन्दा तथा विक्रमशील विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में तिब्बती विद्वान बौद्ध अध्ययन के लिए आते थे।

पाल शासकों के दक्षिण पूर्व एशिया के साथ आर्थिक तथा व्यापारिक सम्बन्ध थे। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ उनका व्यापार उनके लिए बड़ा लाभदायक था और इससे पाल साम्राज्य की समृद्धि बढ़ी। मलाया, जावा, सुमात्रा तथा पड़ोसी द्वीपों पर राज्य करने वाले शैलेन्द्र वंश के बौद्ध शासकों ने पाल-दरबार में अपने राजदूतों को भेजा और नालन्दा में एक मठ की स्थापना की अनुमति माँगी। उन्होंने पाल शासक देवपाल से इस मठ के खर्च के लिए पाँच ग्रामों का अनुदान माँगा। देवपाल ने उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। इससे हमें इन दोनों के निकट सम्बन्धों के बारे में पता चलता है।

धर्मपाल (७७०-८१० ई.)- गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल ७७० ई. में सिंहासन पर बैठा। धर्मपाल ने ४० वर्षों तक शासन किया। धर्मपाल ने कन्‍नौज के लिए त्रिदलीय संघर्ष में उलझा रहा। उसने कन्‍नौज की गद्दी से इंद्रायूध को हराकर चक्रायुध को आसीन किया। चक्रायुध को गद्दी पर बैठाने के बाद उसने एक भव्य दरबार का आयोजन किया तथा उत्तरापथ स्वामिन की उपाधि धारण की। धर्मपाल बौद्ध धर्मावलम्बी था। उसने काफी मठ व बौद्ध विहार बनवाये।

उसने भागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय का निर्माण करवाया था। उसके देखभाल के लिए सौ गाँव दान में दिये थे। उल्लेखनीय है कि प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय एवं राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने धर्मपाल को पराजित किया था।

देवपाल (८१०-८५० ई.)- धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल गद्दी पर बैठा। इसने अपने पिता के अनुसार विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। इसी के शासनकाल में अरब यात्री सुलेमान आया था। उसने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाई। उसने पूर्वोत्तर में प्राज्योतिषपुर, उत्तर में नेपाल, पूर्वी तट पर उड़ीसा तक विस्तार किया। कन्‍नौज के संघर्ष में देवपाल ने भाग लिया था। उसके शासनकाल में दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रहे। उसने जावा के शासक बालपुत्रदेव के आग्रह पर नालन्दा में एक विहार की देखरेख के लिए ५ गाँव अनुदान में दिए।

देवपाल ने ८५० ई. तक शासन किया था। देवपाल के बाद पाल वंश की अवनति प्रारम्भ हो गयी। मिहिरभोज और महेन्द्रपाल के शासनकाल में प्रतिहारों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया।
११वीं सदी में महीपाल प्रथम ने ९८८ ई.-१००८ ई. तक शासन किया। महीफाल को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है। उसने समस्त बंगाल और मगध पर शासन किया।
महीपाल के बाद पाल वंशीय शासक निर्बल थे जिससे आन्तरिक द्वेष और सामन्तों ने विद्रोह उत्पन्‍न कर दिया था। बंगाल में केवर्त, उत्तरी बिहार मॆम सेन आदि शक्‍तिशाली हो गये थे।
रामपाल के निधन के बाद गहड़वालों ने बिहार में शाहाबाद और गया तक विस्तार किया था।
सेन शसकों वल्लासेन और विजयसेन ने भी अपनी सत्ता का विस्तार किया।
इस अराजकता के परिवेश में तुर्कों का आक्रमण प्रारम्भ हो गया।


पाल वंश

पाल राज्य का क्षेत्र
पाल राज्य के बुद्ध और बोधिसत्त्व
धर्मपाल का राज्य

पाल साम्राज्य मध्यकालीन भारत का एक महत्वपूर्ण शासन था जो कि ७५० - ११७४ इसवी तक चला। पाल राजवंश ने भारत के पूर्वी भाग में एक साम्राज्य बनाया। इस राज्य में वास्तु कला को बहुत बढावा मिला। पाल राजा बौद्ध थे।

यह पूर्व मध्यकालीन राजवंश था। जब हर्षवर्धन काल के बाद समस्त उत्तरी भारत में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक गहरा संकट उत्पन६न हो गया, तब बिहार, बंगाल और उड़ीसा के सम्पूर्ण क्षेत्र में पूरी तरह अराजकत फैली थी।

इसी समय गोपाल ने बंगाल में एक स्वतन्त्र राज्य घोषित किया। जनता द्वारा गोपाल को सिंहासन पर आसीन किया गया था। वह योग्य और कुशल शासक था, जिसने ७५० ई. से ७७० ई. तक शासन किया। इस दौरान उसने औदंतपुरी (बिहार शरीफ) में एक मठ तथा विश्‍वविद्यालय का निर्माण करवाया। पाल शासक बौद्ध धर्म को मानते थे। आठवीं सदी के मध्य में पूर्वी भारत में पाल वंश का उदय हुआ। गोपाल को पाल वंश का संस्थापक माना जाता है।

धर्मपाल (७७०-८१० ई.)

देवपाल (८१०-८५० ई.)

महीपाल

पालवंश के शासकसंपादित करें

पाल राजवंश के पश्चात सेन राजवंश ने बंगाल पर १६० वर्ष राज किया।


पाल समाज का इतिहास -


History of Gaderia Samaaj

Gaderia Samaaj - 

गडरिया, धनगर समाज के नाम सन्देश

सभी धनगर, 
गडरिया भाइयो को सूचित किया जाता है कि सभी भाई अपनी कौम की खातिर अपना योगदान करे |

ये बात सत्य है की धनगर समाज भारत की प्राचीन जातियों में से एक है | हमारे समाज ने पूरे विश्व को अपना अनोखा योगदान दिया है | जैसे “मेष“ राशी , “मेष” राशी सभी राशियों में पहली व सर्वोतम राशी है |

आसमान में मोजूद नक्षत्रमंडल में “aries” या “मेष “ अपने आप में धनगर समाज के पुराने गौरव को दर्शाता है जिसकी खोज या उसका नामकरण किसी “गड़ेरिया” या “धनगर“ ने की होगी | “आर्या” जो की या तो भारत से बहार गए थे या बहार से भारत आये थे | परन्तु वे अपने साथ “गढ़” अर्थात “भेड़” “बकरी” रखते थे इसीलिए उन्हें “गढ़” + “आर्य” अर्थात “गडरिया” कहलाये | “देवनागरी” व “संस्कृत” भाषा “गडरिया” लोगो की ही देन है|
ये बात भी सत्य है की “वेद” ग्रन्थो की रचना “आर्यों” अर्थात “गढ़ार्यो/गडरिया” ने की थी | वेदों में बहुत सी जगह “मेष” सब्द का प्रयोग हुआ है जो “धनगर/गडरिया” जैसे महान लोगो को दर्शता है |

भारत का किसी पुराने ज़माने में नाम “आर्यावत” था | यानी “अर्यो का वतन” उस समय भारत में सिर्फ “गडरिया” अर्थात “धनगर” का हे राज था |   

अफगानिस्तान में आज भी “गंधार” जगह आज भी मोजूद है , जहाँ आज भी लोग भेड़ बकरी पालन का काम करते, गंधार जगह का नाम “गड़रियो” के कारन हे पड़ा |
उत्तराखंड में “गढ़वाल” क्षेत्र आज भी मोजूद है जहा आज भी विभिन जातिया भेड़ बकरी का पालन करते है | हिंदी में “गढ़” शब्द का अर्थ “भेड़” “बकरी” से है | इसी वजह से इस क्षेत्र का नाम “गढ़वाल” पड़ा |

“मध्य भारत” के राज्य “मध्य प्रदेश” जहाँ आज भी “गडरिया” समाज की बहुतात में जनसंख्या है | मध्य प्रदेश में “गडरियाखेडा” नाम से जगह है जिसका वर्तमान नाम “गदरवाडा” है है “ग़दर” शब्द का मध्य भारत की भाषा में अर्थ “भेड़” “बकरी” होती है| मध्य प्रदेश के “विधिशा” - “भोपाल ” मंडल में मोजूद “ग़दरमल” मंदिर जो की 800-900 A.D. के करीब किसी “गडरिया” राजा ने बनवाया था इसी कारन इस मंदिर का नाम“ग़दरमल” पड़ा|
मध्य भारत में “होलकर साम्राज्य” “धनगर” अर्थात गड़रियो का ही राजवंश है | जिसने भारत देश को “महान देवी अहिल्या बाई होलकर” जैसे महान रानी दी जिसने ना केवल हिन्दू समाज को मुगलों से बचाया बल्कि मुगलों दुवारा तोड़े गए मंदिरों को दुबारा बनवाया| स्वंत्रता सेनानी “यशवंतराव होलकर” व रानी “भीमाबाई होलकर” जैसे वीर स्वंत्रता सेनानी दिए | ग्वालियर जिले के गडरिया “तानसेन” का नाम तो सभी लोग जानते है जिनका गोत्र “बानिया” था इसी जाति से ताल्लुक रखते थे |
दक्षिण भारत में “गडरिया / धनगर” “कुरुबा” नाम से जाना जाता है जिसने भारत को “विजय नगर” साम्राज्य दिया | “कनकदास” “कालीदास” जैसे सन्त दिए | “संगोल्ली रायान्ना” जैसे स्वंत्रता सेनानी दिए जिन्होंने अपने प्राण देश के खातिर निरछावर कर दिए थे |

कहा जाता है की भारत की जादातर जातिया गडरिया समाज से निकली है | जिनमे अहीर , गुजर , कुर्मी, जाट ब्राहमण, बनिया , राजपूत  विशेष है |

:-चौधरी अनिल पथरिया (धनगर) (नॉएडा) :-  प

भारत वर्ष के तमाम धनगर (शेफर्ड) समाज के नाम सन्देश

यह बात सत्य है की धनगर समाज भारत के तमाम हिस्सों में फैला है परन्तु यह समाज देश के कोने कोने में अलग अलग नाम से जाना जाता है , इस धनगर समाज ने इंडिया स्तर पर अपनी नेशनल आइडेंटिटी (रास्ट्रीय पहचान) नहीं बनाई है | इसके पीछे कई कारण है पहला कारण यह की जिस वक़्त भारत आजाद हुआ था उस समय धनगर समाज का कोई रास्ट्रीय नेता नहीं था, अगर गैर समाज को देखा जाये तो उनका कोई न कोई नेता था उन्हें आजाद भारत ने मंत्री मंडल में किसी न किसी समाज का नेता भी बनाया गया था जैसे

ब्राहमण : जवाहरलाल नेहरु
कायस्थ : लाल बहादुर शास्त्री
कुर्मी व गुर्जर : वल्लभ भाई पटेल
मेहतर(भंगी) तथा सर्व दलित समाज : बाबा भीम राव आंबेडकर
राजपूत : (डाटा उपलब्ध नहीं है)
जाट :   (डाटा उपलब्ध नहीं है)
सिख :  (डाटा उपलब्ध नहीं है)
अहीर(यादव): दिल्ली का पहला मुख्यमंत्री
मुसलमान : (डाटा उपलब्ध नहीं है)    

परन्तु धनगर समाज का कोई नेता नहीं था जो धनगर समाज को उस समय सही रास्ता देखता , किसी गैर समाज के नेता ने भी धनगर समाज को सही रास्ता नहीं दिखाया | धनगर समाज इसी वजह से पिछड़ते पिछड़ते इतना पिछड़ गया की 1990 तक अपना कोई सांसद , विधायक नहीं बना पाया और इस समय तक गैर समाज अपने सेन्टर में कई नेता बना चुके थे, परन्तु अपना समाज गैर समाज के नेताओ को ही नेतागिरी करने वाला समझ चूका था (वैसे ये स्तिथि आज भी है), कुछ समाज ने तो धनगर समाज को राजनीती में न उठने देने के लिए तरह तरह के श्लोक व कहानी तक तयार कर ली जैसे
अहार(यादव) समाज : “गड़ेरिया अहीर भाई भाई, भाई(गड़ेरिया) भाई(यादव) को ही वोट देगा” , “यादव समाज गड़ेरिया समाज के बेटे के सामान है बाप(गड़ेरिया) को बेटे(यादव) की बात माननी चाहिए”,

जाट : हम ऊँची जात है हम राजनीती में खड़े होंगे गड़ेरिया समाज नहीं, “हमे वोट दे दो हम तुमे कुछ जमीन दे देदेंगे “
मुस्लमान : “मुस्लिम में एकता है मुस्लमान के वोट फलानी पार्टी को नहीं जायंगे अगर हमारी बजाय गड़ेरिया को टिकेट मिला तो”
ब्रहमिन : “अनपद गावर समाज राजनीती में आकार क्या करेगा ?”
ये बाते उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , राजस्थान , हरयाणा उत्तराखंड में आज भी कही जाती है |

आज धनगर समाज को गैर समाज से राजनीती साथ नहीं मिल रहा है, परिणाम यह होता है की जब धनगर समाज राजनीती में खड़ा होता है तो कुछ समाज तो धनगर कैंडिडेट के राजनीती में होने से इतना चिड़ते है की उनको वोट ही नहीं देते वो सोचते है की “अगर धनगर समाज को वोट दे दिया तो धनगर समाज वी वैल्यू बढ़ जायगी”, “या धनगर समाज के इस कैंडिडेट की वजह से उसकी बिरादरी को टिकट नहीं मिला”, “हम धनगर समाज को वोट नहीं देंगे”
इन तमाम कारणों से तंग आकार धनगर समाज ने हुंकार भरी और अपने छोटे छोटे दल का एकत्रित किया या राजनीती में आने के लिए उत्तेजित किया|जिसके पीछे कई कारण है| गैर समाज के विधायको या सांसदों से जब धनगर समाज को मदद की जरुरत पड़ी तो इन हरामखोरो ने तरह तरह के ताने या साफ़ साफ माना कर दिया, और इनके इस जरा से ना ने धनगर समाज को कही भूमि से भूमिहिंन कर दिया(किसी दबंग लोगो के धनगर की जमीन पर कब्ज़ा करने या दबंगों के परेशान करने से, किसी वजह से सरकार ने धनगर की जमीं ले ली अगर कोई नेता उनका साथ देता दो सायद सरकार उनकी जमींन छोड़ देती क्यों की बहुत लोगो की जमीन किसी विधायक या सांसद की मदद से लोग चुदा लेते है , या किसी न किसी और अन्य कारण से धनगर समाज को अपनी खुद की जमीन से हात धोना पड़ा)
                                 इन्ही “धनगर समाज के वोटो के भिखारियों” से तंग आकार धनगर समाज ने राजनीती में कदम रखा , और उत्तर प्रदेश में तो जैसे धनगर समाज ने बिगुल ही बजा दिया , यहाँ धनगर समाज के कई विधायक , राज्यसभा , लोकसभा सांसद , ऍम० एल० सी०, राज्य मंत्री , कैबिनेट मंत्री बने, परन्तु समाज का पिछड़ा पन्न दूर न हो सका|
अगर धनगर समाज आज़ादी के टाइम से राजनीती में आता तो सायद गैर समाज की तरह आज हम भी धनगर गवर्नमेंट चलते , हमारे भी नेता ताकतवर होते , हम कई पार्टियों के वोट बैंक होते |

या जब भारत आजाद हुआ था तो कोई अपना धनगर समाज का नेता होता जो अपने धनगर समाज की स्तिथि को सरकार के सामने रखतातो सायद आज हम अनुसूचित जन जाति में होते क्यों की धनगर समाज एक घुमाकड़ समाज था और आज भी है |

आज गैर समाज के लोग धनगर समाज का वोट लेने के लिए नए नए फंडे अपना रहे है जैसे धनगर समाज के सरनेम का उपयोग कर रहे है जैसे

•        नारायण पाल खटीक समाज से है ये उत्तराखंड के विधायक  रहे है
•        राघव लखन पाल ब्राहमण समाज से है ये सहारनपुर से विधायक है
•        जगदम्बिका पाल ये राजपूत समाज से है ये डुमरियागंज से सांसद है
•        मोहन पाल खटीक समाज से है , उत्तराखंड की भीमताल सीट से थे
•        मुनसीराम पाल खटीक समाज से है , बिजनौर से सांसद रह चुके है 

हम धनगर समाज को इन गैर समाज व धनगर कौम के साथ खिलवाड़ करने वाले लोगो से सावधान रहना है 

आंबेडकर जी ने धनगर समाज के साथ क्यों इन्साफ नहीं किया ?

आंबेडकर साहब आज दलितों का भगवान् है , परन्तु उन्होंने बस दलितों का भला किया है , धनगर समाज के लिए उनके पास शोध का टाइम न निकल पाया तो उन्हें जैसे तैसे आंख बंद करके किसी भी बोरी में दाल दिया , और ऐसा सिर्फ धनगर समाज के साथ नहीं बल्कि कई अन्य समाज के साथ भी हुआ है , परन्तु आंबेडकर साहब ने अपने समाज को दिन रात एक करके उन पर अध्यन करके हर राज्य में उनुसुचित जाति या अनुसूचित जनजाति में डाला परन्तु धनगर समाज को कही एस०सी० तो कही एस०टी० तो कही ओ० बी०सी० में , परन्तु धनगर समाज व अन्य कुछ समाज को दलितों के हाथो का खिलौना बना कर चले गए जैसे की मायावती ये धनगर समाज को एस० सी० में डालने का झांसा दे कर उनका वोट मांग रही है परन्तु यह बात धनगर समाज अच्छी तरह जानता है की मायावती धनगर समाज को एस०सी० में नहीं डालेगी, मुलायम सिंह भी यही खेल खेल रहा है| महारासत्रा में भी शरद पवार धनगरो को एस०टी० में डालने जा झांसा देता आया है , परन्तु वह बुढा हो गया अभी तक मामला अटकाया हुआ है राजीव गाँधी जी के कहने पर भी इस कमीनों ने धनगरो को एस०टी० में नहीं डाला, पंजाब में भी ऐसा मामला आया है |      

धनगर समाज का अंग कौन कौन है और किस नाम से जाने जाते है ?

उत्तर प्रदेश के पाल , बघेल, गड़ेरिया, धनगर
मध्य प्रदेश के पाल , बघेल , गड़ेरिया , ग़दर , होलकर

**मध्य प्रदेश में बघेल किस जातिया लगाती है जैसे बघेलखंड(रीवा , सतना , सीधी , शहडोल आदि जिले) के राजपूत ,  विधिशा के एस०टी० , जबलपुर मंडल के एस०सी०, और कुछ जंगली जातिया
महारास्ट्र के धनगर , हटकर , होलकर
उत्तराखंड के पाल , गड़ेरिया , धनगर

** उत्तराखंड में पाल टाइटल कुछ पहाड़ी जातिया लगाती है जो धनगर समाज का अंग नहीं है , खटिक समाज भी वह पाल टाइटल का उपयोग करता है , उत्तराखंड के कुछ राजपूत भी पाल शब्द का प्रयोग करते है
राजस्थान के पाल , बघेल , होलकर , गड़ेरिया

** राजस्थान में बघेल कुछ राजपूत जातिया भी लगाती है , रायका/रेबारी/मलधारी समाज ने अपने आपको अभी धनगर समाज का अंग नहीं माना है , उनके रीती रिवाज़ गड़ेरिया समाज से अलग है , उनके शादी बियाह भी अलग रीती रिवाज़ से होते है , जोधपुर जिले में धनगर समाज व रेबारी समाज दोनों है परन्तु दोनों समाज अपनी बेटी एक दुसरे समाज में नहीं बिहते  इस से पता चलता है दोनों भिन भिन जातिया है , राजस्थान की ओ०बी०सी० लिस्ट में ये दोनों जातिया अलग अलग है , दोनों जातियों का जाति प्रमाण पत्र अलग अलग बनता है

गुजरात में गड़ेरिया , धनगर , होलकर
** गुजरात में बघेल या बाघेला या वाघेला राजपूत लोग लिखते है , भरवाड समाज भी रेबारी समाज की तरह भिन है!   
धनगर समाज की कविता  उत्साह भरने के लिए नॉएडा (उत्तर प्रदेशके धनगर छोरे  का एक प्रयास -

हे ! वीर धनगरो एकता के सूत्र में बांध कर तो देखो !

               
अगर तुमने कुहराम  मचा दिया तो कहना !

अपने धनगर भाइयो को राजनीती में उतर कर तो देखो !

               
हमने कल को धनगर प्रधान मंत्री  बना दिया तो कहना !

अखाड़ो में धनगर भाइयो को उतार कर दो देखो !

               
हम दबंगई से दुश्मनों को  भगाया तो कहना !

अपने समाज की बालिकाओ को पढ़ा लिखा कर तो देखो !

               
बिछेंदरी पाल की तरह अपना नाम इतिहास के 
पन्नो पर न गड्वाया लिया तो कहना !

अपने बच्चो को उच्च स्तर के स्कूलो में      
                                             पढ़ा लिखा कर तो देखो !

               
कल को धनगरो बच्चा साइंटिस्ट  बना तो कहना !

अपने बिजनिस को आगे बाधा कर तो देखो !

               
काल को टाटा अम्बानी  बन कर दिखाया तो कहना !

धनगर बच्चो को स्पोर्ट्स में ला कर तो देखो !

               
तुमने कल को वर्ल्ड कप  जीता दिया तो कहना !

बस अपने समाज को ही सर्वोच मनो !

               
दूसरा समाज तुम्हारे तलवे  चाटने लगे तो कहना !

किसी दुश्मन से डरो घबराओ मत उनका सामना करके तो देखो !

               
कल को दुश्मन दुम दबा कर भागता नज़र  आया तो कहना !

बस एक बार भारत के हर राज्य में 
                                अपनी आवाज उठा कर तो देखो !

               
सबसे जादा भारत में तुम्हारी आबादी  हुई तो कहना !

अपनी धनगर जाति को अपने नाम 
                                        के पीछे लगा कर दो देखो !
               
कल को धनगर फेमस  हो गए तो कहना !

अपनी गाड़ी के आगे पीछे धनगर (पालबघेल)
                                                        लिख कर तो देखो !
               
सबसे जादा गाड़ी तुम्हारी  हुई तो कहना !

अपने घर के बहार धनगर भवन
                              की नेम प्लेट लगवा कर तो देखो !

               
कॉलोनी में सबसे जादा भवन तुम्हारे  हुए तो कहना !

अपने समाज के लिए कुछ धन एकत्रित करके तो देखो !

               
समाज ने जल्दी तरक्की  की तो कहना !

बस एक बार समाज के लिए  सही अपने 

                          खुद के लिए आरक्षण के लिए लड़ करके तो देखो 
!
             
तुमने धनगर समाज के लिए कोई नेक काम 

                                   न करके दिखाया तो कहना !
एक बार एकता के सूत्र में बंध कर के देखो तो !

               
तुमने आरक्षण  पा लिया तो कहना !
अगर निभा  सको ये वादे !

               
तो खुद को महान धनगर समाज का अंग मत कहना !


जय पाल समाज।

जय लोकमाता अहिल्या बाई..